(N/A) क्रिस्टलीकरण: यह ठोस कार्बनिक यौगिकों के शुद्धिकरण के लिए सबसे अधिक उपयोग की जाने वाली तकनीकों में से एक है।
सिद्धांत: यह दिए गए विलायक में यौगिक और अशुद्धियों की घुलनशीलता में अंतर पर आधारित है। अशुद्ध यौगिक को ऐसे विलायक में घोला जाता है जिसमें यह कमरे के तापमान पर कम घुलनशील हो लेकिन उच्च तापमान पर अधिक घुलनशील हो। विलयन को ठंडा करने पर,शुद्ध यौगिक क्रिस्टल के रूप में अलग हो जाता है।
उदाहरण: अशुद्ध एस्पिरिन का पुन: क्रिस्टलीकरण करके शुद्ध एस्पिरिन प्राप्त की जाती है।
$(b)$ आसवन: इस विधि का उपयोग वाष्पशील तरल पदार्थों को गैर-वाष्पशील अशुद्धियों से या उन तरल पदार्थों के मिश्रण से अलग करने के लिए किया जाता है जिनके क्वथनांक में पर्याप्त अंतर होता है।
सिद्धांत: यह इस तथ्य पर आधारित है कि अलग-अलग क्वथनांक वाले तरल पदार्थ अलग-अलग तापमान पर वाष्पित होते हैं।
उदाहरण: क्लोरोफॉर्म $(b.p. = 334 \ K)$ और एनिलिन $(b.p. = 457 \ K)$ के मिश्रण को आसवन द्वारा अलग किया जा सकता है।
$(c)$ वर्णलेखन (क्रोमैटोग्राफी): यह कार्बनिक यौगिकों के पृथक्करण और शुद्धिकरण के लिए सबसे उपयोगी विधियों में से एक है।
सिद्धांत: यह स्थिर प्रावस्था (stationary phase) पर गतिशील प्रावस्था (mobile phase) के प्रभाव में मिश्रण के व्यक्तिगत घटकों की गति में अंतर पर आधारित है।
उदाहरण: लाल और नीली स्याही के मिश्रण को क्रोमैटोग्राफी द्वारा अलग किया जा सकता है।