(N/A) प्रेरणिक प्रभाव: जब भी कोई इलेक्ट्रॉन-आकर्षक या इलेक्ट्रॉन-दाता समूह मौजूद होता है,तो एक संतृप्त श्रृंखला के साथ सिग्मा ( $\sigma$ ) इलेक्ट्रॉनों का स्थायी विस्थापन प्रेरणिक प्रभाव कहलाता है। प्रेरणिक प्रभाव $+I$ प्रभाव या $-I$ प्रभाव हो सकता है।
$-I$ प्रभाव: जब कोई परमाणु या समूह हाइड्रोजन की तुलना में इलेक्ट्रॉनों को अपनी ओर अधिक मजबूती से आकर्षित करता है,तो उसे $-I$ प्रभाव कहा जाता है।
$+I$ प्रभाव: जब कोई परमाणु या समूह हाइड्रोजन की तुलना में इलेक्ट्रॉनों को अपनी ओर कम मजबूती से आकर्षित करता है,तो उसे $+I$ प्रभाव कहा जाता है।
इलेक्ट्रोमेरिक प्रभाव: इसमें आक्रमणकारी अभिकर्मक की उपस्थिति में बहु-बंधों द्वारा जुड़े दो परमाणुओं में से किसी एक पर $\pi$ इलेक्ट्रॉनों के साझा युग्म का पूर्ण स्थानांतरण शामिल होता है। यह एक अस्थायी प्रभाव है।
$(a)$ $Cl_3CCOOH > Cl_2CHCOOH > ClCH_2COOH$: अम्लता के इस क्रम को प्रेरणिक प्रभाव ($-I$ प्रभाव) के आधार पर समझाया जा सकता है। जैसे-जैसे क्लोरीन परमाणुओं की संख्या बढ़ती है,$-I$ प्रभाव बढ़ता है,जो कार्बोक्सिलेट आयन को स्थिर करता है और अम्ल की शक्ति को बढ़ाता है।
$(b)$ $CH_3CH_2COOH > (CH_3)_2CHCOOH > (CH_3)_3C \cdot COOH$: अम्लता के इस क्रम को प्रेरणिक प्रभाव ($+I$ प्रभाव) के आधार पर समझाया जा सकता है। जैसे-जैसे एल्काइल समूहों की संख्या बढ़ती है,$+I$ प्रभाव बढ़ता है,जो कार्बोक्सिलेट आयन को अस्थिर करता है और अम्ल की शक्ति को कम करता है।