(N/A) कणों की व्यवस्था के आधार पर,ठोसों को मुख्य रूप से दो भागों में वर्गीकृत किया गया है:
$(i)$ क्रिस्टलीय ठोस
$(ii)$ अक्रिस्टलीय ठोस
$(i)$ क्रिस्टलीय ठोस: वह ठोस जिसमें घटक कणों की व्यवस्था निश्चित और क्रमबद्ध होती है,उसे क्रिस्टलीय ठोस कहते हैं।
एक क्रिस्टलीय ठोस बड़ी संख्या में छोटे क्रिस्टलों से बना होता है,जिनमें से प्रत्येक का एक निश्चित ज्यामितीय आकार होता है।
क्रिस्टल में,घटक कणों (परमाणु,अणु या आयन) की व्यवस्था त्रिविमीय (three-dimensional) रूप में क्रमबद्ध और पुनरावर्ती होती है। इसमें दीर्घ-परासी व्यवस्था (long-range order) होती है,जिसका अर्थ है कि कणों की व्यवस्था का एक नियमित पैटर्न पूरे क्रिस्टल में समय-समय पर दोहराया जाता है।
क्रिस्टलीय ठोसों का गलनांक निश्चित होता है और एक विशिष्ट तापमान पर वे अचानक पिघलकर तरल बन जाते हैं। वे विषमदैशिक (anisotropic) होते हैं,जिसका अर्थ है कि उनके भौतिक गुण जैसे विद्युत प्रतिरोध या अपवर्तनांक अलग-अलग दिशाओं में मापने पर अलग-अलग मान दिखाते हैं। उदाहरणों में $NaCl$ और क्वार्ट्ज शामिल हैं।
$(ii)$ अक्रिस्टलीय ठोस: 'अक्रिस्टलीय' (amorphous) शब्द ग्रीक शब्द 'amorphos' से आया है,जिसका अर्थ है 'कोई रूप नहीं'।
अक्रिस्टलीय ठोसों में,घटक कणों में दीर्घ-परासी व्यवस्था नहीं होती है। उनमें केवल लघु-परासी व्यवस्था (short-range order) होती है,जहाँ नियमित और पुनरावर्ती पैटर्न केवल कम दूरी तक ही देखा जाता है।
अक्रिस्टलीय ठोस तापमान की एक सीमा के दौरान नरम हो जाते हैं और उन्हें विभिन्न आकारों में ढाला जा सकता है। वे प्रकृति में समदैशिक (isotropic) होते हैं,जिसका अर्थ है कि उनके भौतिक गुण सभी दिशाओं में समान होते हैं। उदाहरणों में कांच,रबर और प्लास्टिक शामिल हैं।