(N/A) सिद्धांत: चुंबकीय क्षेत्र में रखी गई धारावाही कुंडली एक चुंबकीय बल आघूर्ण (torque) का अनुभव करती है,जो कुंडली को घुमाने की प्रवृत्ति रखती है और धारा के समानुपाती कोणीय विक्षेप उत्पन्न करती है।
संरचना: चल कुंडली धारामापी में कई फेरों वाली एक कुंडली होती है,जो एक समान त्रिज्यीय (radial) चुंबकीय क्षेत्र में एक निश्चित अक्ष के परितः घूमने के लिए स्वतंत्र होती है।
कुंडली के अंदर एक बेलनाकार नरम लोहे का क्रोड रखा जाता है,जो न केवल चुंबकीय क्षेत्र को त्रिज्यीय बनाता है बल्कि चुंबकीय क्षेत्र की तीव्रता को भी बढ़ाता है।
दोनों ध्रुवों के बीच चुंबकीय क्षेत्र एक समान होता है,जिससे यह सुनिश्चित होता है कि कुंडली के क्षेत्रफल सदिश और चुंबकीय क्षेत्र $\overrightarrow{B}$ के बीच का कोण हमेशा $90^{\circ}$ (अर्थात $\theta = 90^{\circ}$) रहता है।
इसलिए,लूप पर लगने वाला चुंबकीय बल आघूर्ण $\tau = NIAB \sin(90^{\circ}) = NIAB$ है,जो अधिकतम बल आघूर्ण है।
एक स्प्रिंग $S_{p}$ एक प्रत्यानयन बल आघूर्ण $K\phi$ प्रदान करती है जो चुंबकीय बल आघूर्ण $NIAB$ को संतुलित करता है,जिसके परिणामस्वरूप एक स्थिर कोणीय विक्षेप $\phi$ प्राप्त होता है।
यह विक्षेप स्प्रिंग से जुड़े एक संकेतक (pointer) द्वारा पैमाने पर दर्शाया जाता है,जो विद्युत धारा के मान को मापता है।