(N/A) परमाणु त्रिज्या को बंध की प्रकृति के आधार पर परिभाषित किया जाता है,जैसे कि धात्विक त्रिज्या या सहसंयोजक त्रिज्या,जो बंधित परमाणुओं के बीच की अंतर-नाभिकीय दूरी की आधी होती है।
$(a)$ जब कोई परमाणु इलेक्ट्रॉन प्राप्त करता है,तो वह ऋण आयन (ऋणायन) बनाता है। ऋणायन की त्रिज्या हमेशा उसके मूल उदासीन परमाणु से बड़ी होती है। इसका कारण यह है कि एक या अधिक इलेक्ट्रॉनों के जुड़ने से इलेक्ट्रॉन-इलेक्ट्रॉन प्रतिकर्षण बढ़ जाता है,जबकि प्रभावी नाभिकीय आवेश $(Z_{eff})$ कम हो जाता है,जिससे इलेक्ट्रॉन बादल फैल जाता है।
$(b)$ जब कोई परमाणु इलेक्ट्रॉन खोता है,तो वह धन आयन (धनायन) बनाता है। धनायन की त्रिज्या हमेशा उसके मूल उदासीन परमाणु से छोटी होती है। इसका कारण यह है कि इलेक्ट्रॉन खोने से शेष इलेक्ट्रॉनों पर प्रभावी नाभिकीय आवेश बढ़ जाता है,जो इलेक्ट्रॉन बादल को नाभिक के करीब खींचता है।
संक्षेप में,समइलेक्ट्रॉनिक प्रजातियों के लिए: $\text{धनायन की त्रिज्या} < \text{उदासीन परमाणु की त्रिज्या} < \text{ऋणायन की त्रिज्या}$.