(N/A) द्विध्रुव आघूर्ण $(\mu)$ का महत्व और अनुप्रयोग निम्नलिखित हैं:
$1$. ध्रुवीयता का अनुमान: यह एक बंध की ध्रुवीयता का माप है। जिस अणु का द्विध्रुव आघूर्ण शून्य नहीं होता,वह ध्रुवीय होता है,जबकि शून्य द्विध्रुव आघूर्ण वाला अणु अध्रुवीय होता है (जैसे,$H_2, O_2, CO_2$)।
$2$. आणविक ज्यामिति निर्धारित करना: द्विध्रुव आघूर्ण अणुओं के आकार की भविष्यवाणी करने में मदद करता है। उदाहरण के लिए,$H_2O$ की संरचना बेंट (मुड़ी हुई) होती है जिसमें $\mu = 1.84 \ D$ होता है,जबकि $CO_2$ की संरचना रैखिक होती है जिसमें $\mu = 0$ होता है।
$3$. आयनिक लक्षण की गणना: इसका उपयोग सहसंयोजक बंध में आयनिक लक्षण के प्रतिशत की गणना करने के लिए किया जाता है: $\text{Percentage ionic character} = (\frac{\mu_{obs}}{\mu_{calc}}) \times 100$,जहाँ $\mu_{obs}$ प्रेक्षित द्विध्रुव आघूर्ण है और $\mu_{calc}$ $100$% आयनिक लक्षण मानकर गणना किया गया द्विध्रुव आघूर्ण है।
$4$. समावयवियों को अलग करना: यह सिस (cis) और ट्रांस (trans) समावयवियों के बीच अंतर करने में मदद करता है। सामान्यतः,सिस-समावयवी का द्विध्रुव आघूर्ण ट्रांस-समावयवी से अधिक होता है।