(N/A) आर्किमिडीज का सिद्धांत: "जब किसी वस्तु को किसी तरल में आंशिक या पूर्ण रूप से डुबोया जाता है, तो उस पर कार्य करने वाला उत्प्लावन बल वस्तु द्वारा विस्थापित तरल के भार के बराबर होता है और यह विस्थापित तरल के गुरुत्व केंद्र से ऊपर की दिशा में कार्य करता है।"
उपपत्ति:
चित्र में दिखाए अनुसार, $h$ ऊँचाई और $A$ अनुप्रस्थ काट क्षेत्रफल वाला एक ठोस घन $\rho$ घनत्व वाले तरल में सतह से $x$ गहराई पर स्थित है।
वस्तु के बाईं और दाईं ओर कार्य करने वाले बल समान और विपरीत होते हैं, इसलिए वे एक-दूसरे के प्रभाव को निरस्त कर देते हैं।
वस्तु की ऊपरी सतह पर दबाव $P_{1} = x \rho g$ है।
वस्तु की निचली सतह पर दबाव $P_{2} = (x + h) \rho g$ है।
ऊपरी सतह पर कार्य करने वाला बल $F_{1} = P_{1} A = x \rho g A$ (नीचे की ओर)।
निचली सतह पर कार्य करने वाला बल $F_{2} = P_{2} A = (x + h) \rho g A$ (ऊपर की ओर)।
वस्तु पर कार्य करने वाला उत्प्लावन (परिणामी) बल $F_{b}$:
$F_{b} = F_{2} - F_{1}$
$F_{b} = (x + h) \rho g A - x \rho g A$
$F_{b} = h \rho g A$
यहाँ $A h = V$ (वस्तु का आयतन), और वस्तु का आयतन विस्थापित तरल के आयतन के बराबर होता है:
$F_{b} = V \rho g$
चूंकि द्रव्यमान $m = V \rho$ होता है, इसलिए:
$F_{b} = m g$
यह बल ऊपर की दिशा में कार्य करता है। यहाँ $m$ विस्थापित तरल का द्रव्यमान है। अतः, उत्प्लावन बल = विस्थापित तरल का भार। इस प्रकार आर्किमिडीज का सिद्धांत सिद्ध होता है।