(N/A) क्रिस्टलीकरण ठोस कार्बनिक यौगिकों के शुद्धिकरण के लिए सबसे अधिक उपयोग की जाने वाली तकनीकों में से एक है।
सिद्धांत: यह एक उपयुक्त विलायक में यौगिक और अशुद्धियों की घुलनशीलता में अंतर पर आधारित है। यौगिक आमतौर पर गर्म विलायक में अधिक घुलनशील और ठंडे विलायक में कम घुलनशील होता है।
विधि:
$1$. अशुद्ध यौगिक को एक उपयुक्त विलायक की न्यूनतम मात्रा में घोला जाता है,जिसमें यह कमरे के तापमान पर कम घुलनशील होता है लेकिन उच्च तापमान पर काफी घुलनशील होता है।
$2$. यौगिक को पूरी तरह से घोलने के लिए घोल को गर्म किया जाता है और फिर अघुलनशील अशुद्धियों को दूर करने के लिए गर्म अवस्था में ही छान लिया जाता है।
$3$. फिर गर्म घोल को धीरे-धीरे ठंडा होने दिया जाता है। जैसे-जैसे घोल ठंडा होता है,शुद्ध यौगिक के क्रिस्टल बन जाते हैं।
$4$. क्रिस्टल को शेष तरल (मातृ द्रव - mother liquor) से छानकर अलग कर लिया जाता है। मातृ द्रव में अशुद्धियाँ और घुले हुए यौगिक की थोड़ी मात्रा होती है।
$5$. यदि यौगिक एक विलायक में अत्यधिक घुलनशील है और दूसरे में बहुत कम घुलनशील है,तो इन विलायकों के मिश्रण का उपयोग करके क्रिस्टलीकरण किया जा सकता है।
$6$. जो अशुद्धियाँ घोल को रंग देती हैं,उन्हें सक्रिय चारकोल (activated charcoal) पर अधिशोषित करके हटा दिया जाता है।
$7$. समान घुलनशीलता वाली अशुद्धियों वाले यौगिकों के शुद्धिकरण के लिए बार-बार क्रिस्टलीकरण आवश्यक है।
फ्लोचार्ट:
अशुद्ध यौगिक के क्रिस्टल का घोल $\rightarrow$ निस्यंद (Filtrate) $\rightarrow$ (अवक्षेप: शुद्ध यौगिक के क्रिस्टल) और (निस्यंद: मातृ द्रव जिसमें अशुद्धियाँ + यौगिक की बहुत कम मात्रा होती है)।