(N/A) जिन कार्बोक्सिलिक अम्लों में $\alpha$-हाइड्रोजन होता है,उन्हें लाल फास्फोरस की अल्प मात्रा की उपस्थिति में क्लोरीन या ब्रोमीन के साथ उपचारित करने पर $\alpha$-स्थान पर हैलोजनीकरण होता है,जिससे $\alpha$-हैलो-कार्बोक्सिलिक अम्ल प्राप्त होते हैं। इस अभिक्रिया को 'हेल-वोलहार्ड-जेलिंस्की' अभिक्रिया के रूप में जाना जाता है।
$RCH_{2}COOH \xrightarrow[(ii)\ H_{2}O]{(i)\ X_{2}/\text{Red } P} RCH(X)COOH$
जहाँ,$X = Cl, Br$ है।
यह हैलोजनीकरण अभिक्रिया तब तक जारी रहती है जब तक $\alpha$-हाइड्रोजन उपलब्ध होते हैं।
उदाहरण: एथेनोइक अम्ल का क्लोरीनीकरण:
$CH_{3}COOH$ $\xrightarrow{Cl_{2}/\text{Red } P} CH_{2}ClCOOH$ $\xrightarrow{Cl_{2}/\text{Red } P} CHCl_{2}COOH$ $\xrightarrow{Cl_{2}/\text{Red } P} CCl_{3}COOH$
उपयोग: इस अभिक्रिया का उपयोग अम्ल के $\alpha$-स्थान पर $Cl$ या $Br$ को प्रतिस्थापित करके $-OH, -CN, -NH_{2}$ जैसे समूहों को जोड़ने के लिए किया जाता है।