(N/A) परागण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा परागकोष से मुक्त हुए परागकणों को स्त्रीकेसर के वर्तिकाग्र पर स्थानांतरित किया जाता है। चूंकि पुष्पी पादपों में नर और मादा युग्मक अचल होते हैं,इसलिए निषेचन के लिए उन्हें एक साथ लाना आवश्यक है।
पराग के स्रोत के आधार पर,परागण को तीन प्रकारों में विभाजित किया गया है:
$(1)$ स्व-युग्मन (Autogamy): इस प्रकार में,परागण एक ही पुष्प के भीतर होता है। परागकणों को परागकोष से उसी पुष्प के वर्तिकाग्र तक स्थानांतरित किया जाता है। इसके लिए पराग मुक्ति और वर्तिकाग्र की ग्राह्यता में तालमेल होना आवश्यक है,और परागकोष तथा वर्तिकाग्र को एक-दूसरे के करीब होना चाहिए। यह द्विलिंगी पुष्पों में सामान्य है।
$(2)$ सजातपुष्पी परागण (Geitonogamy): इसमें एक ही पादप के एक पुष्प के परागकोष से परागकणों का दूसरे पुष्प के वर्तिकाग्र पर स्थानांतरण शामिल है। हालांकि यह कार्यात्मक रूप से पर-परागण है जिसमें परागण एजेंट शामिल होते हैं,आनुवंशिक रूप से यह स्व-युग्मन के समान है क्योंकि परागकण एक ही पादप से आते हैं।
$(3)$ पर-परागण (Xenogamy): इसमें एक पादप के परागकोष से परागकणों का दूसरे पादप के वर्तिकाग्र पर स्थानांतरण शामिल है। यह परागण का एकमात्र प्रकार है जो परागण के दौरान आनुवंशिक रूप से भिन्न प्रकार के परागकणों को वर्तिकाग्र तक लाता है।