(N/A) जब मोनो-प्रतिस्थापित बेंजीन में दूसरा प्रतिस्थापन किया जाता है,तो आने वाले समूह की स्थिति बेंजीन वलय से पहले से जुड़े समूह द्वारा निर्धारित होती है। इस घटना को पहले समूह का निर्देशक प्रभाव (directive influence) कहा जाता है।
दूसरे प्रतिस्थापन की स्थिति बेंजीन वलय पर पहले से मौजूद प्रतिस्थापी की प्रकृति पर निर्भर करती है,न कि आने वाले समूह की प्रकृति पर।
बेंजीन में दो प्रकार के निर्देशक प्रभाव देखे जाते हैं:
$(a)$ ऑर्थो-पैरा निर्देशक समूह: ये समूह ऑर्थो और पैरा स्थिति पर इलेक्ट्रॉन घनत्व बढ़ाते हैं,जिससे वे इलेक्ट्रॉनरागी प्रतिस्थापन के लिए अधिक सक्रिय हो जाते हैं। उदाहरण: $-OH, -NH_{2}, -NHR, -NHCOCH_{3}, -OCH_{3}, -R (\text{जैसे, } -CH_{3}, -C_{2}H_{5}), -Cl, -F, -I, -Br$.
$(b)$ मेटा निर्देशक समूह: ये समूह ऑर्थो और पैरा स्थिति पर इलेक्ट्रॉन घनत्व कम करते हैं,जिससे मेटा स्थिति इलेक्ट्रॉनरागी प्रतिस्थापन के लिए अपेक्षाकृत अधिक अनुकूल हो जाती है। उदाहरण: $-NO_{2}, -CN, -CHO, -COOH, -COR, -SO_{3}H, -COOR, -\stackrel{+}{NH}_{3}$.
यदि बेंजीन वलय पर पहले से ही एक मेटा-निर्देशक समूह मौजूद है,तो आने वाला इलेक्ट्रॉनरागी $(E^{+})$ मेटा स्थिति पर जुड़ता है।