(N/A) शुक्राणुजनन वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा अपरिपक्व नर जनन कोशिकाएं (शुक्राणुजन) वृषण में शुक्राणुओं का उत्पादन करती हैं,जो यौवनारंभ पर शुरू होती है।
शुक्राणुजनन में दो मुख्य चरण शामिल हैं: $(1)$ शुक्राणु-प्रसू (spermatids) का निर्माण और $(2)$ शुक्राणु कायांतरण (spermiogenesis)।
$(1)$ शुक्राणु-प्रसू का निर्माण: यह प्रक्रिया तीन चरणों में होती है:
$(i)$ गुणन चरण: शुक्रजनक नलिकाओं की आंतरिक दीवार पर मौजूद शुक्राणुजन समसूत्री विभाजन द्वारा विभाजित होते हैं। प्रत्येक शुक्राणुजन द्विगुणित $(2n)$ होता है और इसमें $46$ गुणसूत्र होते हैं।
(ii) वृद्धि चरण: प्रत्येक शुक्राणुजन पोषक तत्वों को संचित करके आकार में बढ़ता है और अब इसे प्राथमिक शुक्राणु कोशिका कहा जाता है। यह सरटोली कोशिकाओं से पोषण प्राप्त करता है।
(iii) परिपक्वता चरण: प्राथमिक शुक्राणु कोशिकाएं अर्धसूत्रीविभाजन से गुजरती हैं। प्रथम अर्धसूत्रीविभाजन (अर्धसूत्रीविभाजन-$I$) के परिणामस्वरूप दो समान,अगुणित $(n)$ कोशिकाएं बनती हैं जिन्हें द्वितीयक शुक्राणु कोशिकाएं कहा जाता है,जिनमें प्रत्येक में $23$ गुणसूत्र होते हैं। इसके बाद वे दूसरे अर्धसूत्रीविभाजन (अर्धसूत्रीविभाजन-$II$) से गुजरकर चार समान,अगुणित शुक्राणु-प्रसू उत्पन्न करती हैं।
$(2)$ शुक्राणु कायांतरण: अचल शुक्राणु-प्रसू का परिपक्व,गतिशील शुक्राणुओं में परिवर्तन शुक्राणु कायांतरण कहलाता है।
शुक्राणु कायांतरण के बाद,शुक्राणु के शीर्ष सरटोली कोशिकाओं में अंतःस्थापित हो जाते हैं और अंततः शुक्राणु-मोचन (spermiation) नामक प्रक्रिया द्वारा शुक्रजनक नलिकाओं से मुक्त कर दिए जाते हैं।