(N/A) $\rightarrow$ मेंढक की त्वचा: श्लेष्म (mucus) की उपस्थिति के कारण मेंढक की त्वचा चिकनी और फिसलन भरी होती है। त्वचा पर बाह्य कंकाल नहीं होता है और यह हमेशा नम बनी रहती है।
$\rightarrow$ शरीर की पृष्ठीय सतह का रंग सामान्यतः जैतून जैसा हरा होता है जिस पर गहरे अनियमित धब्बे होते हैं। उदर सतह पर त्वचा समान रूप से हल्के पीले रंग की होती है।
$\rightarrow$ मेंढक कभी पानी नहीं पीता है, बल्कि त्वचा के माध्यम से इसका अवशोषण करता है।
$\rightarrow$ मेंढक का शरीर सिर और धड़ में विभाजित होता है। गर्दन और पूंछ का अभाव होता है।
$\rightarrow$ मुख के ऊपर नासिका छिद्रों की एक जोड़ी उपस्थित होती है।
$\rightarrow$ आँखें उभरी हुई होती हैं और निमेषक पटल (nictitating membrane) से ढकी होती हैं जो पानी में उनकी रक्षा करती हैं।
$\rightarrow$ आँखों के दोनों ओर एक झिल्लीनुमा कर्णपटह (tympanum) होता है जो ध्वनि संकेतों को ग्रहण करता है।
$\rightarrow$ अग्रपाद और पश्चपाद तैरने, चलने, कूदने और बिल बनाने में मदद करते हैं।
$\rightarrow$ पैरों की उंगलियों के बीच झिल्ली (webbed digits) होती है जो तैरने में सहायता करती है।
$\rightarrow$ मेंढक में लैंगिक द्विरूपता: मेंढक लैंगिक द्विरूपता प्रदर्शित करते हैं। नर मेंढक को ध्वनि उत्पन्न करने वाली वाक-कोश (vocal sacs) और अग्रपाद की पहली उंगली पर मैथुन गद्दी (copulatory pad) की उपस्थिति से पहचाना जा सकता है, जो मादा मेंढक में अनुपस्थित होते हैं।
$\rightarrow$ प्रजनन काल के दौरान नर मेंढक की त्वचा का रंग गहरा पीला हो जाता है। मादाओं में रंग में ऐसा कोई परिवर्तन नहीं होता है।
$\rightarrow$ नर मेंढक में उदर क्षेत्र संकरा और चपटा होता है, जबकि प्रजनन ऋतु के दौरान मादा का उदर अंडाशय में असंख्य अंड कोशिकाओं के विकास के कारण चौड़ा और फूला हुआ हो जाता है।