(N/A) परिभाषा: अष्टक नियम के अनुसार,तत्वों के परमाणु इस प्रकार संयोजित होते हैं कि उनके संयोजी कोश में आठ इलेक्ट्रॉन हों,जिससे उन्हें उत्कृष्ट गैस जैसी इलेक्ट्रॉनिक विन्यास प्राप्त हो सके।
अष्टक नियम का महत्व:
- यह अणुओं और आयनों की संरचना की भविष्यवाणी करने में मदद करता है।
- यह उन परमाणुओं की स्थिरता को समझाता है जो पूर्ण अष्टक प्राप्त करते हैं।
- यह अणु या आयन में परमाणुओं के औपचारिक आवेश (formal charge) की गणना करने में उपयोगी है।
- यह कार्बनिक यौगिकों और दूसरे आवर्त के तत्वों के यौगिकों में बंधन को समझने के लिए बुनियादी समझ प्रदान करता है।
अष्टक नियम की सीमाएँ:
$I$. केंद्रीय परमाणु का अपूर्ण अष्टक:
कुछ यौगिकों में,केंद्रीय परमाणु के चारों ओर इलेक्ट्रॉनों की संख्या आठ से कम होती है। यह विशेष रूप से समूह $1, 2,$ और $13$ के तत्वों के लिए सामान्य है (जैसे,$LiCl, BeH_2, BeCl_2, BF_3, AlCl_3$)।
$II$. विषम-इलेक्ट्रॉन अणु:
विषम संख्या में इलेक्ट्रॉन वाले अणुओं में,जैसे कि नाइट्रिक ऑक्साइड $(NO)$ और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड $(NO_2)$,सभी परमाणुओं के लिए अष्टक नियम को संतुष्ट नहीं किया जा सकता है।
$III$. विस्तारित अष्टक:
आवर्त सारणी के तीसरे आवर्त और उसके बाद के तत्वों में बंधन के लिए $d$-कक्षक उपलब्ध होते हैं। ये तत्व केंद्रीय परमाणु के चारों ओर आठ से अधिक इलेक्ट्रॉनों को समायोजित कर सकते हैं,जिससे विस्तारित अष्टक बनता है (जैसे,$PF_5, SF_6, H_2SO_4$)।