(A) चूंकि अयस्क को हवा में गर्म करने पर $SO_2$ गैस निकलती है,इसलिए यह एक सल्फाइड अयस्क है।
धातुकर्म के चरण इस प्रकार हैं:
$(i)$ अयस्क का सांद्रण: सल्फाइड अयस्कों के लिए आमतौर पर फेन प्लवन विधि का उपयोग किया जाता है।
$(ii)$ भर्जन (Roasting): सांद्रित सल्फाइड अयस्क को हवा की अधिकता में गर्म करके धातु ऑक्साइड में परिवर्तित किया जाता है।
$(iii)$ अपचयन (Reduction): धातु ऑक्साइड को कार्बन जैसे अपचायक का उपयोग करके या स्वतः अपचयन द्वारा धातु में परिवर्तित किया जाता है।
$(b)$ $(i)$ $Zn(s) + CuSO_4(aq) \rightarrow ZnSO_4(aq) + Cu(s)$: यह अभिक्रिया होगी क्योंकि $Zn$,$Cu$ से अधिक सक्रिय है और इसे कॉपर सल्फेट के घोल से विस्थापित कर सकता है।
$(ii)$ $Fe(s) + ZnSO_4(aq) \rightarrow FeSO_4(aq) + Zn(s)$: यह अभिक्रिया नहीं होगी क्योंकि $Fe$,$Zn$ से कम सक्रिय है और यह जिंक सल्फेट के घोल से जिंक को विस्थापित नहीं कर सकता है।