(N/A) हाइगेन्स के सिद्धांत के अनुसार,तरंगाग्र का प्रत्येक बिंदु एक स्वतंत्र द्वितीयक स्रोत के रूप में कार्य करता है और छोटी द्वितीयक तरंगिकाएं उत्सर्जित करता है।
हाइगेन्स के सिद्धांत में यह माना गया था कि इन द्वितीयक तरंगिकाओं का आयाम आगे की दिशा में अधिकतम और पीछे की दिशा में शून्य होता है।
हालाँकि,हाइगेन्स यह सैद्धांतिक रूप से नहीं समझा सके कि तरंग पीछे की ओर क्यों नहीं फैलती है; यह एक तदर्थ (ad-hoc) धारणा थी।
बाद में,वोग्ट और किर्चॉफ जैसे वैज्ञानिकों ने गणितीय स्पष्टीकरण दिया कि द्वितीयक तरंग की तीव्रता $(1 + \cos \theta)^2$ के समानुपाती होती है,जहाँ $\theta$ तरंगाग्र और संचरण की दिशा के बीच का कोण है।
आगे की दिशा में,$\theta = 0^{\circ}$ होता है,इसलिए तीव्रता का कारक $(1 + \cos 0^{\circ})^2 = (1 + 1)^2 = 4$ (अधिकतम) होता है।
पीछे की दिशा में,$\theta = 180^{\circ}$ (या $\pi$ रेडियन) होता है,इसलिए तीव्रता का कारक $(1 + \cos 180^{\circ})^2 = (1 - 1)^2 = 0$ होता है। अतः,पीछे की दिशा में तरंग का संचरण नहीं होता है।